#इन्दु_बाला_सिंह
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता लोकोक्ति यूँ ही
नहीं बनी ।
गाँव की सरलता सहजता , रिश्तों का महत्व
मान हम शहर में नहीं पा सकते । महानगर में
तो बिलकुल नहीं ।
अपना परिवार घट रहा है । पति पत्नी को सह
नहीं पा रहा है । बच्चे पिता को सह नहीं पा रहे हैं
। घर की औरतें अपनी नौकरी और घरेलू
ज़िम्मेवारी में हल्कान हैं । पड़ोस के इंसान
आपस में बात नहीं करते । घरों में कुत्ते पल रहे
हैं ।
हमारे संस्कार के बीच खाई है । हम या तो
शहरी रहें या गवइं रहें ।
न जाने कैसे हमने विदेश का चलन आत्मसात्
कर लिया ।
तो भैया जहां रहो वहाँ की चाल अपनाओ ।
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