Sunday, 26 January 2025

रंग न बदलें



#इन्दु_बाला_सिंह


अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता लोकोक्ति यूँ ही 


नहीं बनी । 


गाँव की सरलता सहजता , रिश्तों का महत्व 


मान हम शहर में नहीं पा सकते । महानगर में 


तो बिलकुल नहीं ।


अपना परिवार घट रहा है । पति पत्नी को सह 


नहीं पा रहा है । बच्चे पिता को सह नहीं पा रहे हैं 


। घर की औरतें अपनी नौकरी और घरेलू 


ज़िम्मेवारी में हल्कान हैं । पड़ोस के इंसान  


आपस में बात नहीं करते । घरों में कुत्ते पल रहे 


हैं ।


हमारे संस्कार के बीच खाई है । हम  या तो 


शहरी रहें या गवइं रहें ।


 न जाने कैसे हमने विदेश  का चलन आत्मसात् 


कर लिया ।


तो भैया जहां रहो वहाँ की चाल अपनाओ ।



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